मंदिर में घंटा सुनते ही आ जाते हैं गौ-कौवे शक्तिपीठ देवीपाटन में

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आजतक ख़बरें,बलरामपुर: 51 सिद्ध शक्तिपीठों में शुमार सुप्रसिद्ध मंदिर देवीपाटन में प्रतिदिन आदिशक्ति मां का भोग लगाने के बाद कौवे, कुत्ते, गाय व अन्य पक्षियों को भोजन कराने के बाद ही रसोइया किसी को खाना परोसता है। प्रतिदिन दोपहर 12 बजे व रात आठ बजे भोग लगाया जाता है। भोग लगाने के लिए मंदिर के पुजारी एक पात्र में चावल लेकर बाहर निकलते हैं। जैसे ही घंटे और नगाड़े की आवाज शुरू होती है, नियत स्थान पर पुजारी के पहुंचने से पहले ही काफी संख्या में कुत्ते, कौवे व अन्य पक्षी एकत्र हो जाते हैं।

मंदिर में भोग लगाने के बाद चावल पशु-पक्षियों में बांट दिया जाता है। मंदिर के व्यवस्थापक महंत मिथिलेश नाथ योगी कहते हैं कि मंदिर पर सबका अंश होता है। यह भी कर्तव्य होता है कि आमजन के अलावा पशु-पक्षी भी भूखे न रहे। इसके लिए यह प्रथा बनाई गई थी। गौरैया व कबूतर के पालने की भी व्यवस्था की गई है। यह भी सदियों से हजारों की संख्या में मंदिर कार्यालय के छत पर बने घोंसले में रहते हैं। इन्हें भी प्रतिदिन दाना और पानी दिया जाता है। यह दिन भर दूर-दूर तक उड़ान भरते हैं। शाम को अपने घोंसले में लौट आते हैं। दाना डालने का यहां भी नियत समय है। जैसे ही दाना डालने का समय होता है।

सभी कबूतर भी अपने घोंसले पर एकत्र हो जाते हैं। मंदिर के कर्मचारी व महंत को यह कबूतर भलीभांति पहचानते भी हैं। महंत के मुताबिक मौसम में बदलाव होने के कारण इस समय कौवे व अन्य पक्षियों की आमद कम हुई है। ऐसे में गाय व कुत्तों को चावल खिलाकर परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। मंदिर परिसर में स्थित बरगद का पेड़ कई वर्षों पुराना है। इस बरगद पेड़ पर चमगादड़ों का बसेरा है।मां के दर्शन के बाद लोग बरगद पर लटक रहे चमगादड़ों को देखते हैं। इनकी संख्या एक दो नहीं बल्कि हजारों में हैं।यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए किसी कौतूहल से कम नहीं है।

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