समाज में रूप बदल कर जीने वालों की तादाद बढ़ गई है:बहुरूपिया यासीन

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आजतक खबरें,फरीदाबाद(अमित चौधरी): बहुरूपिए अपना रूप चरित्र के अनुसार बदल लेते हैं और उसी चरित्र के अनुरूप अभिनय करने में प्रवीण होते हैं।अपने श्रृंगार और वेषभूषा की सहायता से वे प्राय: वही चरित्र लगने लग जाते हैं,जिसके रूप की नकल वह करते हैं।कई बार तो असल और नकल में भेद भी नहीं कर पाते हैं और लोग चकरा बहरूपिया कला पूरे राजस्थान में प्रचलित है,ये कहना है फरीद नामक बहरूपिये का जो 33वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में अलग अलग किरदारों का रूप धरे पर्यटकों का मनोरंजन कर रहे हैं।

बहरूपिया फरीद बताते हैं कि भारत में बहुरूप धारण करने की कला बहुत पुरानी है.राजाओं-महराजाओं के समय बहुरूपिया कलाकारों को हुकूमतों का सहारा मिलता था.लेकिन अब ये कलाकार और कला दोनों मुश्किल में है.इन कलाकारों में हिंदू और मुसलमान दोनों हैं.मगर वे कला को मज़हब की बुनियाद पर विभाजित नहीं करते.मुसलमान बहरूपिया कलाकार हिंदू प्रतीकों और देवी-देवताओं का रूप धारण करने में गुरेज़ नहीं करता तो हिंदू भी पीर,फ़कीर या बादशाह बनने में संकोच नहीं करते.

 33वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में आए 6 बहुरूपिया कलाकार भाइयों से एक नारद मुनि का रूप धरे शमशाद बताते  हैं मेरे ख़्याल से सबसे ज़्यादा बहुरूपिया कलाकार राजस्थान में ही हैं.पुरे देश में कोई दो लाख लोग हैं जो इस कला के ज़रिए अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं.शमशाद का कहना है कि समाज में रूप बदल कर जीने वालों की तादाद बढ़ गई है. लिहाजा बहरूपियों की कद्र कम हो गई है.

बहुरूपिया यासीन कहते हैं, “हमें पुरखों ने बताया था कि बहरूपिया बहुत ही ईमानदार कलाकार होता है.राजाओं के दौर में हमारी बड़ी इज़्जत थी.हमें ‘उमरयार’ कहा जाता था.हम रियासत के लिए जासूसी भी करते थे.राजपूत राजा हमें बहुत मदद करते थे और अजमेर में ख्वाज़ा के उर्स के दौरान हम अपनी पंचायत भी करते थे.आज हर कोई भेस बदल रहा है. बदनाम हम होते हैं.लोग अब ताने कसते हैं कि कोई काम क्यों नहीं करते.”

 नौशाद कहते हैं कि बहरूपिया के 52 रूप है.जो भय पैदा कर दे वो ही बहरूपिया है.मगर ये बहरूपिया कलाकार बस्तियों में भाईचारे का पैगाम बाँटते रहे.हम इस कला को ज़िंदा रखना चाहते हैं.हम हिंदू भेस धारण कर मुस्लिम बस्तियों में जाते हैं और प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं. नौशाद कहते हैं कि जब सारा समाज ही भेस बदल रहा तो हमें कोई क्यों पूछेगा,नेता ही सबसे बड़े लिबास बदलने वाले हैं.

बहुरूपिया अब्दुल हमीद दिल्ली में कई वर्षों से इस कला को प्रोत्साहित करते रहे हैं.वो कहते है, “ये कला बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है. मेरे ख़्याल से सबसे ज़्यादा बहरूपिया कलाकार राजस्थान में ही हैं. पूरे देश में कोई दो लाख लोग हैं जो इस कला के ज़रिए अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं.”राजस्थान के सीकर के यासीन को ये फ़न अपने पुरखों से विरासत में मिला है.वो बड़े मन से इस कला का प्रदर्शन करते हैं.लेकिन उनके तीनो बेटों ने इससे हाथ खींच लिया है. बेटों का कहना है कि ‘इस कला की न तो कोई कद्र करता है और ना ही इसका कोई भविष्य है.’

बहुरूपिया कलाकार ने बताया कि हरियाणा सरकार ने इस बार मेले में भाग लेने वाले लोक कलाकारों का पारिश्रमिक 250 रुपये बढ़ाया है।बढ़ती महंगाई और ड्रेस-मेकअप खर्चे के लिहाज से यह काफी कम है। पहले कलाकारों को 500 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया जाता था मगर मनोहर लाल सरकार अब मेले में आए लोक कलाकारों को 750 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान करेगी।इन कलाकारों ने प्रतिदिन एक हजार रुपये भुगतान की माग उठाई है।

ये कलाकार जब अपना हुनर दिखाते हैं और दावा करते हैं कि वे ही असली बहुरूपिए हैं तो तमाशबीन चक्कर में पड़ जाते हैं.उन्हें लगता फिर वो कौन हैं जो ऊँचे मुकाम और मंचो पर बैठे हैं.

 

 

 

 

 

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