बनारसी साड़ी पहनना अलग स्टेटस सिम्बल है :मोहम्मद कलीम

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आजतक ख़बरें,फरीदाबाद(अमित चौधरी):उत्तर भारत में बनारसी साड़ी की अलग पहचान है। बॉलीवुड से लेकर बड़े औद्योगिक घरानों सहित मध्यम वर्गीय परिवारों में भी बनारसी साड़ी पहनना अलग स्टेटस सिम्बल है।बनारसी साड़ी एक विशेष प्रकार की साड़ी है जिसे विवाह आदि शुभ अवसरों पर हिन्दू स्त्रियाँ धारण करती हैं।उत्तर प्रदेश के चंदौली, बनारस, जौनपुर,आजमगढ़, मिर्जापुर और संत रविदासनगर जिले में बनारसी साड़ियाँ बनाई जाती हैं।

बनारस की परंपरागत साड़ी अब आधुनिकता के दौर में अपना रंग और डिजाइन भी बदल रही है। उत्तर भारत में दक्षिण भारतीय सिल्क की साड़ियों का आकर्षण परंपरागत बनारसी साड़ियों पर जब भारी पड़ने लगा तो बनारस के खांटी हस्तशिल्पियों की सूझबूझ को आगे ले जाने के लिए उनके परिवार के ही युवा हस्तशिल्पियों ने इस बदलाव को आगे बढ़ाने का काम शुरू कर दिया है।

बतादें बनारसी कढ़ाई के साथ बंगाल का टशर जॉरजट और आसाम का मूंगा सिल्क भी बनारस के कारीगरों ने अपना लिया है।तीन प्रदेशों के समन्वय से बनी बहुरंगी खाब साड़ी को उत्तर भारत में खूब पसंद किया जा रहा है।खाब से लेकर बनारसी कारीगरों की बंगाल-बिहार के टशर जॉरजट पर मीना कारीगिरी,बनारसी ब्रोकेट पर कडुवां जंगला साड़ी सहित आसाम का मूगा कतान टुपट्टा का नमूना देखना है तो सीधे चले आइए सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में।

इन लुहवनी बनारसी साड़ी को देखने के लिए महिलाओं के कदम मेले के सहभागी देश थाईलैंड पैवेलियन में घुसते ही स्टॉल नंबर 947 पर अपने आप ही रुक जाते हैं जहाँ बनारस के कई कारीगर अपनी कारीगिरी के विशेष नमूने लेकर आए हैं।

बनारसी साड़ी के विषय पर पूछने पर कारीगर मोहम्मद कलीम बताते हैं कि रेशम की साड़ियों पर बनारस में बुनाई के संग ज़री के डिजाइन मिलाकर बुनने से तैयार होने वाली सुंदर रेशमी साड़ी को बनारसी रेशमी साड़ी कहते हैं।ये पारंपरिक काम सदियों से चला आ रहा है और विश्वप्रसिद्ध है।कभी इसमें शुद्ध सोने की ज़री का प्रयोग होता था,किंतु बढ़ती कीमत को देखते हुए नकली चमकदार ज़री का काम भी जोरों पर चालू है।इनमें अनेक प्रकार के नमूने बनाये जाते हैं।इन्हें ‘मोटिफ’ कहते हैं। बहुत तरह के मोटिफों का प्रचलन चल पड़ा है,परन्तु कुछ प्रमुख परम्परागत मोटिफ जो आज भी अपनी बनारसी पहचान बनाए हुए हैं,जैसे बूटी,बूटा, कोनिया, बेल, जाल और जंगला,झालर आदि।

मोहम्मद कलीम ने कहा कि एक साड़ी को बनाने में डिजाइन के अनुसार 16 दिन से 52 दिन तक लगते हैं।हमें सूरजकुंड जैसे मेलों में तो यह साड़ी सीधे बेचने का मौका मिल जाता है और कई बार कला के कद्रदान हमें पूरा भाव भी दे जाते हैं मगर आमतौर पर अब ये साड़ियां ऑर्डर पर ही बिकती हैं।

बनारस के जलालपुरा से आए कारीगर मोहम्मद कलीम बताते हैं कि बनारसी जंगला साड़ी बेशक 8 हजार से 45 हजार तक में तैयार होती है मगर जैसे उसमें हाथ से कढ़ाई का काम होता है वैसे ही उसे बनाने में समयावधि भी बढ़ जाती है।

मालूम हो युवा मोहम्मद कलीम बेशक अभी राज्य पुरस्कार से नवाजे गए हैं तो उनके उनके भाई मोहम्मद सलीम को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

मजहब के विषय पर चर्चा करते हुए मोके पर एक कारीगर कहते हैं यों तो बिनकरी में बिनाई का काम ज्यादातर मुसलमान ही करते हैं।परन्तु इस व्यापार में हिन्दु-मुसलमान,सिक्ख इसाई सारे लोग लगे हुए हैं।कपड़ों के ताने बाने के समान ही इस व्यवसाय में विभिन्न जाति,धर्मावलम्बी,सम्प्रदाय इत्यादि का आपस में ताना बाना हुआ है।सच तो यह है कि बनारस का वस्र व्यवसाय एक रंगी चादर नहीं बहुरंगी चुनरी है जो आपसी भाईचारा, प्रेम, करुणा, सद्भाव सदभावना तथा एकता का एक जीता जागता उदाहरण है।अगर यह नेटवर्क बिगड़ता है तो महजबी एवं फिरका परस्त तथा लालची नेताओं के व्यक्तिगत हित के कारण न कि सामाजिक संरचना के कारण।

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